उत्तराखंड राज्य आंदोलन के प्रख्यात समाजसेवी
देवी सिंह पंवार : संघर्ष, सेवा और जनआंदोलन की प्रेरणादायक गाथा
उत्तराखंड की देवभूमि ने समय-समय पर ऐसे लोगों को जन्म दिया है जिन्होंने अपना पूरा जीवन समाज, संस्कृति और जनसेवा के लिए समर्पित कर दिया। उन्हीं महान व्यक्तित्वों में एक नाम है — देवी सिंह पंवार।
एक ऐसे समाजसेवी, जिन्होंने गरीबी, संघर्ष, आंदोलन, जेल, भूख हड़ताल और विरोध सब कुछ सहा, लेकिन जनता की आवाज़ उठाना कभी नहीं छोड़ा।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
देवी सिंह पंवार का जन्म वर्ष 1953 में उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जनपद के पंडर गांव में हुआ। उनके पिता का नाम श्याम चंद सिंह और माता का नाम कौशल्या देवी था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा कंडियाल गांव में हुई तथा आगे की पढ़ाई जूनियर हाईस्कूल तुलसैंड मुखेम में संपन्न हुई।
बचपन से ही उनके भीतर आध्यात्मिकता और समाज सेवा की भावना थी। यह संस्कार उन्हें अपने पिता से विरासत में मिले। युवा अवस्था में ही उनका मन सांसारिक जीवन से हटकर अध्यात्म की ओर आकर्षित होने लगा।
कम उम्र में वैवाहिक जीवन और आध्यात्मिक यात्रा
करीब 22 वर्ष की आयु में उनका विवाह हो गया, लेकिन जीवन ने जल्द ही बड़ा दुख दिया। मात्र 23 वर्ष की उम्र में उनकी पत्नी का निधन हो गया। इस घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। वे पूरी तरह अध्यात्म की ओर मुड़ गए और घर-परिवार छोड़कर देशभर की यात्रा पर निकल पड़े।
उन्होंने कन्याकुमारी से लेकर जम्मू तक भारत के अनेक धार्मिक स्थलों की यात्राएं कीं। नेपाल के धार्मिक क्षेत्रों में भी भ्रमण किया। इसी दौरान मध्य प्रदेश के खजुराहो में उनकी मुलाकात एक संत से हुई। संत ने उन्हें सलाह दी कि वे गृहस्थ जीवन का त्याग न करें और समाज सेवा को ही अपना धर्म बनाएं।
गांव लौटकर शराब के खिलाफ आंदोलन
करीब तीन वर्षों बाद वे वापस अपने गांव लौटे और एक छोटी दुकान खोली। उस समय गांवों में कच्ची शराब का प्रचलन बहुत अधिक था। विद्यालय जाने वाले बच्चे तक रास्तों में शराब पीते दिखाई देते थे। यह दृश्य उन्हें भीतर तक झकझोर देता था।
वर्ष 1982 में उन्होंने गांवों में चल रही कच्ची शराब की भट्टियों के खिलाफ भूख हड़ताल शुरू कर दी। इस आंदोलन के दौरान उन्हें धमकियां भी मिलीं, लेकिन वे पीछे नहीं हटे। आखिरकार गांव में शराब की भट्टियां बंद हुईं। हालांकि, इस संघर्ष में उन्हें गांव वालों का अपेक्षित साथ नहीं मिला और उन्होंने गांव छोड़ने का फैसला किया।
उत्तरकाशी में मजदूरों के हक की लड़ाई
इसके बाद वे उत्तरकाशी के नेताला क्षेत्र में जाकर रहने लगे, जहां उनके चाचा रहते थे। उन्होंने गणेशपुर क्षेत्र में दुकान खोली। उस समय गढ़वाल विकास निगम की फैक्ट्री में लगभग 40 मजदूर कार्यरत थे, लेकिन वे अस्थायी कर्मचारी थे।
मजदूरों को स्थायी करने की मांग को लेकर वर्ष 1985 में देवी सिंह पंवार सात दिनों तक भूख हड़ताल पर बैठे। इस आंदोलन में स्वर्गीय कमला राम सहित कई लोगों का सहयोग मिला। अंततः प्रशासन और जनरल मैनेजर के आश्वासन के बाद आंदोलन समाप्त हुआ और मजदूरों को स्थायी किया गया।
1991 भूकंप और जनसेवा का बड़ा संघर्ष
वर्ष 1991 में उत्तरकाशी में विनाशकारी भूकंप आया। इस त्रासदी में एक मां और चार बच्चों सहित कई लोगों की मौत हो गई। उस समय देवी सिंह पंवार लखनऊ में थे, लेकिन घटना की खबर मिलते ही वे राहत और बचाव कार्यों में जुट गए।
उन्होंने देखा कि जिन लोगों का वास्तविक नुकसान हुआ, उन्हें पर्याप्त सहायता नहीं मिल रही थी, जबकि कुछ लोग गलत तरीके से राहत सामग्री ले जा रहे थे। इस अन्याय के खिलाफ उन्होंने आवाज उठाई और तत्कालीन जिलाधिकारी राजीव कपूर से कई बार मिले। संघर्ष इतना बढ़ गया कि एक बार उन्होंने जिलाधिकारी को थप्पड़ तक मार दिया, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर टिहरी जेल भेज दिया गया। वे 27 दिनों तक जेल में रहे।
भूकंप पीड़ितों के लिए ऐतिहासिक आंदोलन
वर्ष 1992 में उन्होंने भटवाड़ी तहसील में भूकंप पीड़ितों के पुनर्वास और आठ प्रमुख मांगों को लेकर आमरण अनशन शुरू किया। आंदोलन इतना बड़ा हुआ कि सैकड़ों लोग सड़कों पर उतर आए। धारा 144 लागू हुई, हवाई फायरिंग हुई और लगभग 400 लोगों को गिरफ्तार किया गया।
यह आंदोलन विधानसभा तक पहुंचा और आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा। मृतकों के आश्रितों को 50 हजार रुपये की सहायता दी गई। कई बड़ी संस्थाओं ने गांवों को गोद लिया और सरकार द्वारा मकानों के निर्माण तथा आर्थिक सहायता की व्यवस्था की गई। इस आंदोलन ने हजारों प्रभावित लोगों के जीवन को फिर से पटरी पर लाने में बड़ी भूमिका निभाई।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन में योगदान
देवी सिंह पंवार उत्तराखंड राज्य आंदोलन के सक्रिय योद्धाओं में रहे। वर्ष 1994 में जब अलग उत्तराखंड राज्य की मांग जोर पकड़ रही थी, तब उन्होंने अपने क्षेत्र में आंदोलन की कमान संभाली।
इंद्रमणि बडोनी के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन के समर्थन में उन्होंने उपली रमोली इंटर कॉलेज मुखेम में 90 दिनों तक क्रमिक अनशन चलाया।
2 अक्टूबर 1994 को दिल्ली कूच के दौरान वे मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पहुंचे, जहां आंदोलनकारियों को रोका गया और कई लोग शहीद हुए। उस समय उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी। यह संघर्ष वर्षों तक चलता रहा।
प्रताप नगर तहसील और जनहित आंदोलनों की लड़ाई
देवी सिंह पंवार ने प्रताप नगर क्षेत्र की समस्याओं को लेकर भी कई आंदोलन किए। सड़क, तहसील और जनसुविधाओं की मांग को लेकर लंबगांव में 17 दिनों तक भूख हड़ताल की। प्रशासन के साथ वार्ता के बाद आंदोलन समाप्त हुआ और क्षेत्र के विकास की दिशा में कई निर्णय लिए गए।
वर्ष 1994 में उन्होंने लंबगांव में प्रेस की दुकान खोली और प्रताप नगर तहसील की मांग को लेकर लखनऊ तक संघर्ष किया। कई नेताओं और मंत्रियों से मुलाकात के बाद अंततः प्रताप नगर तहसील का गठन हुआ।
राजनीति और जनप्रतिनिधित्व
देवी सिंह पंवार ने वर्ष 1996 में टिहरी लोकसभा सीट से चुनाव भी लड़ा। बाद में वर्ष 2003 में वे उपली रमोली क्षेत्र से जिला पंचायत सदस्य बने।
2012 में जनता ने उन्हें विधानसभा चुनाव भी लड़ाया, लेकिन धनबल के अभाव में वे चुनाव नहीं जीत सके।
टिहरी बांध प्रभावितों के लिए संघर्ष
टिहरी बांध बनने के बाद प्रभावित परिवारों के हक की लड़ाई में भी देवी सिंह पंवार अग्रिम पंक्ति में रहे। वर्ष 2005 में उन्होंने बांध प्रभावितों के लिए 23 दिनों तक आंदोलन चलाया। आंदोलन के दौरान उन्होंने आत्मदाह का प्रयास भी किया और उन्हें जेल भेज दिया गया। बाद में जनता के भारी दबाव के बाद उनकी जमानत हुई।
समाज सेवा और जनकल्याण
देवी सिंह पंवार ने केवल आंदोलन ही नहीं किए, बल्कि समाज निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
लंबगांव में थाना, नगर पंचायत और PNB बैंक जैसी सुविधाओं के लिए उन्होंने लगातार संघर्ष किया। नगर पंचायत के लिए भवन न मिलने पर उन्होंने अपना निजी मकान तक उपलब्ध कराया।
कोरोना काल 2021 में उन्होंने निरंकारी मिशन के सहयोग से क्षेत्र में निशुल्क दवा शिविर लगाए और जरूरतमंद लोगों की सहायता की।
शराब मुक्त समाज की मुहिम
वर्ष 2023 में उन्होंने गांव-गांव जाकर शराब के खिलाफ अभियान चलाया। उन्होंने लोगों को जागरूक किया कि मांगलिक कार्यों में शराब परोसना समाज के लिए घातक है। इस अभियान में उन्हें शराब माफियाओं की धमकियां भी मिलीं, लेकिन वे डटे रहे। स्कूलों और कॉलेजों में जाकर उन्होंने युवाओं को नशे से दूर रहने का संदेश दिया। आज उनके प्रयासों से कई गांवों में शराब पूरी तरह बंद हो चुकी है।
निशुल्क शिक्षा का सपना
वर्ष 2025 में कुंभ स्नान के दौरान अयोध्या में उनकी मुलाकात संत श्री गोबिंदाचार्य मुक्तेश्वर पांडे से हुई, जो बिहार में नशा मुक्ति अभियान के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। उनसे प्रेरित होकर देवी सिंह पंवार ने क्षेत्र के गरीब बच्चों के लिए निशुल्क विद्यालय खोलने का संकल्प लिया।
इसी संकल्प से “श्री त्रिदंडी देव निःशुल्क शिक्षा निकेतन” विद्यालय की स्थापना हेरवाल गांव में हुई। आज यहां 117 बच्चे निशुल्क शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। विद्यालय के संचालन में संतों और समाजसेवियों का सहयोग मिल रहा है। यह पूरे गढ़वाल मंडल का अनूठा निशुल्क विद्यालय माना जाता है।
आज भी समाज सेवा में सक्रिय
73 वर्ष की आयु में भी देवी सिंह पंवार लगातार समाज सेवा में सक्रिय हैं। उनका मानना है कि वे कोई काम स्वयं नहीं करते, बल्कि भगवान उनसे सेवा करवाते हैं।
वे आज भी उत्तराखंड की राजधानी पहाड़ में बनाए जाने और राज्य को शराब मुक्त करने की मांग उठाते रहते हैं।
निष्कर्ष
देवी सिंह पंवार का जीवन संघर्ष, त्याग, सेवा और जनआंदोलन की मिसाल है। उन्होंने सत्ता या पद के लिए नहीं, बल्कि समाज और जनहित के लिए लड़ाई लड़ी।
उनकी कहानी केवल एक व्यक्ति की जीवनी नहीं, बल्कि उत्तराखंड के संघर्ष और जनचेतना का इतिहास है।






