उत्तरकाशी के गंगाणी मेले ने फिर जगाई प्राचीन परंपराओं की चमक, गंगाणी मेले में मंत्री रामसुंदर नौटियाल का धमाकेदार नृत्य

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RamSundar Nautiyal Uttarakashi news

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उत्तरकाशी जनपद के बड़कोट क्षेत्र स्थित गंगाणी में आयोजित कुण्ड की जातर बसंत-शरदोत्सव मेला इस वर्ष भी आस्था, संस्कृति और लोकपरंपराओं का अद्भुत संगम बनकर संपन्न हुआ। जिला पंचायत उत्तरकाशी के तत्वावधान में आयोजित इस भव्य मेले के समापन अवसर पर भागीरथी घाटी विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष एवं राज्य मंत्री रामसुंदर नौटियाल मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने मंच से उपस्थित हजारों श्रद्धालुओं, जनप्रतिनिधियों और मेले में आए दूर-दराज के ग्रामीणों को संबोधित करते हुए इस आयोजन को क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक एकता का प्रतीक बताया।

इस अवसर पर मंत्री रामसुंदर नौटियाल ने मेले की अवधि तीन दिन से बढ़ाकर पांच दिन करने के निर्णय पर जिला पंचायत अध्यक्ष रमेश चौहान तथा सभी जिला पंचायत सदस्यों को बधाई एवं शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि ऐसे पारंपरिक मेले हमारी लोकसंस्कृति, पौराणिक मान्यताओं और प्राचीन परंपराओं को जीवंत बनाए रखने का सशक्त माध्यम हैं। मेलों के माध्यम से लोकनृत्य, लोकगीत, वेशभूषा, रीति-रिवाज और सामूहिक सहभागिता की परंपरा नई पीढ़ी तक पहुंचती है, जो सांस्कृतिक संरक्षण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

समापन समारोह के दौरान सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने विशेष आकर्षण बटोरा। लोकगायिका रेशमा शाह के लोकप्रिय गीतों पर मंत्री रामसुंदर नौटियाल ने अपने सहयोगियों और जिला पंचायत सदस्यों के साथ पारंपरिक नृत्य कर दर्शकों का उत्साह बढ़ाया। उनके इस सहज सहभाग ने जनसमुदाय के साथ आत्मीय जुड़ाव का संदेश दिया और पूरा पंडाल तालियों और उत्साह से गूंज उठा।

गंगाणी का यह पवित्र स्थल धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्व रखता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार श्रद्धेय जमदग्नि ऋषि ने यहीं कुंड से मां गंगा को प्रकट किया था, जिस कारण इस स्थान का नाम गंगाणी पड़ा। यहां मां गंगा और मां यमुना की पावन धाराओं का संगम क्षेत्र भी माना जाता है, जिससे इस मेले की आध्यात्मिक गरिमा और बढ़ जाती है।

समापन पर क्षेत्रवासियों ने मेले के सफल आयोजन पर जिला पंचायत और प्रशासन का आभार व्यक्त किया तथा आने वाले वर्षों में इसे और व्यापक स्वरूप देने का संकल्प दोहराया। कुण्ड की जातर बसंत-शरदोत्सव मेला गंगाणी की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और लोकआस्था का जीवंत प्रतीक बनकर पुनः इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया।

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